وإذا أصاب الناسَ شدة وبلاء دعَوا ربهم مخلصين له أن يكشف عنهم الضر، فإذا رحمهم وكشف عنهم ضرهم إذا فريق منهم يعودون إلى الشرك مرة أخرى، فيعبدون مع الله غيره.
مجمع الملك فهد لطباعة المصحف الشريف
تفسير الجلالين
«وإذا مسَّ الناس» أي كفار مكة «ضرٌّ» شدة «دعوا ربهم منيبين» راجعين «إليه» دون غيره «ثم إذا أذاقهم منه رحمة» بالمطر «إذا فريقٌ منهم بربهم يشركون».
और जब लोगों को कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो वे अपने रब को, उसकी ओर रुजू (प्रवृत) होकर पुकारते है। फिर जब वह उन्हें अपनी दयालुता का रसास्वादन करा देता है, तो क्या देखते है कि उनमें से कुछ लोग अपने रब का साझी ठहराने लगे;
A translation of the meanings is not the Quran itself, only an attempt to convey its meaning in another language.